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आंखें खोने के बाद सियाचिन फतह किया, सेना के अफसर की अब विश्व कप में सोना जीतने पर नजर

इंदौर: थलसेना के लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश देख नहीं सकते, लेकिन उन्होंने अब भी बंदूक छोड़ी नहीं है और उनका लक्ष्य एकदम स्पष्ट है। निशानेबाजी के 10 मीटर एयर राइफल वर्ग में खेलने वाले द्वारकेश दृष्टिबाधित निशानेबाजों के आगामी विश्व कप में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना चाहते हैं।

थलसेना में सेवा दे रहे संभवत: इकलौते दृष्टिबाधित अफसर द्वारकेश इंदौर से करीब 25 किलोमीटर दूर महू सैन्य छावनी की आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट (एएमयू) में साल भर से अभ्यास कर रहे हैं। वह आवाज के जरिये लक्ष्य का संकेत देने वाले उपकरण (आॅडियो एंिमग डिवाइस) की मदद से निशाना लगाते हैं।

द्वारकेश ने बृहस्पतिवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया,‘‘मैं बचपन से सेना में भर्ती होना चाहता था और मेरा यह सपना 2009 में सच हो गया। सेना में भर्ती होने के बाद भी मैं खेलों से जुड़ा रहा। इसके कुछ साल बाद एक हादसे में आंखें खोने के बाद मुझे काफी वक्त तक समझ नहीं आया कि अब आगे क्या करना है? वर्ष 2022 में मैंने पहली बार जाना कि दृष्टिबाधित निशानेबाजों की भी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाएं होती हैं। फिर मैंने भी इस दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया।’’

उन्होंने बताया कि दुनिया के अलग-अलग देशों में बेहद लम्बे समय से दृष्टिबाधित निशानेबाजों की प्रतियोगिताएं चल रही हैं, लेकिन भारत में कुछ साल पहले ही इस तरह की राष्ट्रीय स्पर्धाओं का सिलसिला शुरू किया गया है।
द्वारकेश के मुताबिक ’10 मीटर एयर राइफल प्रोन’ वर्ग की पिछली दो राष्ट्रीय स्पर्धाओं में वह स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।

थलसेना के 38 वर्षीय अफसर ने बताया कि उन्होंने अक्टूबर-नवंबर के दौरान संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में होने वाले पैराशूंिटग वर्ल्ड कप के दृष्टिबाधित खिलाड़ियों के वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने का लक्ष्य तय किया है।
द्वारकेश, निशानेबाजी के अलावा तैराकी की अलग-अलग राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भी अव्वल रह चुके हैं। वह 2021 में सियाचिन ग्लेशियर फतह करने का कीर्तिमान बना चुके हैं।

उन्होंने बताया कि निशानेबाजी की ताजा हलचल और दांव-पेंच समझने के लिए वह चैट-जीपीटी का भी इस्तेमाल करते हैं और उनका ध्यान उनके खेल के लक्ष्यों पर पूरी तरह केंद्रित है। अपनी ंिजदगी का फसलफा साझा करते हुए द्वारकेश ने कहा,‘‘अब तक के अनुभवों से मैंने यही जाना है कि कड़ी मेहनत कभी नाकाम नहीं होती। अगर आप कड़ी मेहनत करते हुए अपनी राह पर आगे बढ़ते रहे, तो एक न एक दिन आपको मंजिल जरूर मिलेगी।’’

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