मुख्य समाचारहेल्थ & लाइफ-स्टाइल

एक तिहाई स्कूली बच्चे निजी कोचिंग लेते हैं, शहरों में यह प्रवृत्ति अधिक : केंद्र सरकार का सर्वेक्षण

नयी दिल्ली. देश के करीब एक तिहाई स्कूली छात्र निजी कोचिंग का सहारा लेते हैं और यह प्रवृत्ति शहरी क्षेत्रों में अधिक आम है. केंद्र द्वारा शिक्षा पर कराए गए व्यापक वार्षिक मॉड्यूलर सर्वेक्षण (सीएमएस)में यह खुलासा हुआ है. सर्वेक्षण के मुताबिक सरकारी स्कूल पूरे भारत में शिक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण अहम भूमिका निभाते हैं और अब भी विद्यालयों में नामांकित कुल छात्रों में 55.9 प्रतिशत हिस्सेदारी सरकारी विद्यालयों की है.

सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया, ”ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर अधिक है, जहां दो-तिहाई (66.0 प्रतिशत) छात्र सरकारी विद्यालयों में नामांकित हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह दर 30.1 प्रतिशत है. निजी गैर-सहायता प्राप्त (मान्यता प्राप्त) विद्यालयों में देशभर में 31.9 प्रतिशत छात्र नामांकित हैं.” राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के 80वें दौर का हिस्सा, सीएमएस शिक्षा सर्वेक्षण, विशेष रूप से स्कूली शिक्षा में वर्तमान में नामांकित छात्रों के घरेलू खर्च पर केंद्रित था. सर्वेक्षण के दौरान कंप्यूटर-सहायता प्राप्त व्यक्तिगत साक्षात्कार (सीएपीआई) का उपयोग करके पूरे भारत में 52,085 परिवारों और 57,742 छात्रों से आंकड़े एकत्रित किये गए.

सर्वेक्षण के मुताबिक करीब एक तिहाई छात्र (27.0 प्रतिशत) चालू शैक्षणिक वर्ष के दौरान निजी कोचिंग ले रहे थे या ले चुके थे. यह प्रवृत्ति ग्रामीण क्षेत्रों (25.5 प्रतिशत) की तुलना में शहरी क्षेत्रों (30.7 प्रतिशत) में अधिक आम थी. इसके अनुसार शहरी क्षेत्रों में प्रति छात्र निजी कोचिंग पर औसत वार्षिक घरेलू व्यय (3,988 रुपये) है जो ग्रामीण क्षेत्रों (1,793 रुपये) की तुलना में अधिक है.

रिपोर्ट में कहा गया, ” यह अंतर उच्च कक्षाओं के साथ बढ़ता जाता है. शहरी क्षेत्र में उच्चतर माध्यमिक स्तर पर निजी कोचिंग पर औसतन 9,950 रुपये खर्च किये जाते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह औसतन 4,548 रुपये है. राष्ट्रीय स्तर पर कक्षाओं के साथ कोचिंग का खर्च भी बढ़ता है और पूर्व प्राथमिक में जहां औसतन 525 रुपये खर्च होते हैं, वह उच्चतम माध्यमिक कक्षाओं में बढ़कर 6,384 हो जाते हैं.” सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में स्कूली शिक्षा पर खर्च करने वाले छात्रों में से 95 प्रतिशत ने बताया कि उनके वित्तपोषण का पहला प्रमुख स्रोत परिवार के अन्य सदस्य हैं. यह प्रवृत्ति ग्रामीण (95.3 प्रतिशत) और शहरी (94.4 प्रतिशत) दोनों क्षेत्रों में समान रूप से देखी गई. भारत में, 1.2 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि सरकारी छात्रवृत्तियां उनकी स्कूली शिक्षा के लिए वित्तपोषण का पहला प्रमुख स्रोत है.

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) द्वारा किया गया पिछला व्यापक शिक्षा सर्वेक्षण 75वां दौर (जुलाई 2017-जून 2018)में किया गया था. अधिकारियों ने हालांकि, स्पष्ट किया कि इसके निष्कर्षों की तुलना वर्तमान सर्वेक्षण के निष्कर्षों से सीधे तौर पर नहीं की जा सकती.

शिक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ”एनएसएस के 75वें दौर में आंगनवाड़ी केंद्रों को पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत वर्गीकृत नहीं किया गया था और स्कूली शिक्षा पर व्यय में निजी कोचिंग भी शामिल थी. हालांकि, इस सर्वेक्षण में आंगनवाड़ियों को पूर्व-प्राथमिक श्रेणी में वर्गीकृत किया और स्कूली शिक्षा और निजी कोचिंग पर खर्च के आंकड़ों को अलग से एकत्र और प्रस्तुत किया गया.” सर्वेक्षण के मुताबिक सभी प्रकार के विद्यालयों में, चालू शैक्षणिक वर्ष के दौरान प्रति छात्र सबसे अधिक औसत व्यय पाठ्यक्रम शुल्क (7,111 रुपये) पर हुआ, जिसके बाद अखिल भारतीय स्तर पर पाठ्यपुस्तकों और कॉपी-कलम आदि पर (2,002 रुपये) खर्च हुआ.
सर्वेक्षण के मुताबिक, ”शहरी परिवार सभी श्रेणियों में काफी ज्यादा खर्च कर रहे हैं. उल्लेखनीय है कि शहरी क्षेत्रों में पाठ्यक्रम शुल्क पर औसत व्यय 15,143 रुपये अनुमानित था, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 3,979 रुपये अनुमानित था. शहरी क्षेत्रों में उच्च व्यय का यह रुझान परिवहन, वर्दी और पाठ्यपुस्तकों जैसे अन्य प्रकार के शिक्षा-संबंधी खर्चों पर दिखता है.”

admin

Vedant Bhoomi is a trusted name in the real estate industry, dedicated to crafting sustainable, elegant, and high-quality living spaces. With a deep understanding of design, nature, and community living, we aim to create projects that inspire a harmonious and fulfilling lifestyle.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button