परसा कोयला खदान के लिए मंजूरी रद्द करने की मांग

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रायपुर. छत्तीसगढ़ के जैव विविधता संपन्न हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खदानों की मंजूरी के विरोध के बीच राज्य सरकार ने केंद्र से परसा खुली खदान परियोजना के लिए वन के भू-उपयोग में बदलाव संबंधी अनुमोदन को रद्द करने का अनुरोध किया है. राज्य सरकार के अधिकारियों ने मंगलवार को यह जानकारी दी.

उन्होंने बताया कि केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वन महानिदेशक को सोमवार को लिखे पत्र में छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को आवंटित परसा कोयला खदान के लिए 841.548 हेक्टेयर वन भूमि के गैर वानिकी उपयोग की मंजूरी को रद्द करने की मांग की है. छत्तीसगढ़ सरकार ने पत्र में कहा है कि हसदेव अरण्य कोलफील्ड में व्यापक जन विरोध के कारण कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो गई है.

राज्य के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अवर सचिव केपी राजपूत द्वारा लिखे गए पत्र में कहा गया है, ‘‘हसदेव अरण्य कोयला क्षेत्र में व्यापक जन विरोध के कारण कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो गई है. जन विरोध, कानून व्यवस्था और व्यापक लोकहित के मद्देनजर परसा खुली खदान परियोजना (रकबा 84.548 हेक्टेयर) में जारी वन भू उपयोग परिवर्तन स्वीकृति को निरस्त करने के संबंध में उचित कार्यवाही करने का कष्ट करें.\’\’

गौरतलब है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस वर्ष मार्च में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात कर राज्य को आवंटित कोयला ब्लॉकों के विकास में आ रही बाधाओं को दूर करने की मांग की थी. इसके बाद राज्य के परसा खदान (सरगुजा और सूरजपुर जिले) के लिए 841.548 हेक्टेयर वन भूमि और पीईकेबी के दूसरे चरण (सरगुजा) के लिए 1,136.328 हेक्टेयर वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग की अनुमति दी गई थी.

हसदेव अरण्य क्षेत्र में आरआरवीयूएनएल को आवंटित एक अन्य कोयला ब्लॉक-कांटे विस्तार जन सुनवाई के लिए लंबित है. हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले स्थानीय ग्रामीण पिछले कई महीनों से इन खदानों के आवंटन का विरोध कर रहे हैं.
कोयला खदानों के आवंटन का विरोध कर रहे छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन (सीबीए) के संयोजक आलोक शुक्ला ने कहा कि राज्य सरकार को खुद कोयला परियोजनाओं के लिए दी गई अंतिम मंजूरी को रद्द करना चाहिए.

शुक्ला ने कहा, ‘‘ परसा कोयला परियोजना की अनुमति रद्द करने की राज्य सरकार की मांग को एक लंबे संघर्ष के बाद जीत की तरह देखा जाना चाहिए. हालांकि, राज्य सरकार को खुद परियोजना को दी गई अपनी अंतिम मंजूरी वापस लेनी चाहिए.\” उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने परसा परियोजना के लिए वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा दो के तहत वन मंजूरी का अंतिम आदेश जारी किया था और इसे वापस लेना पूरी तरह से उसके अधिकार क्षेत्र में है.

शुक्ला ने कहा कि परसा कोयला ब्लॉक के लिए वन मंजूरी ग्राम सभा के फर्जी प्रस्ताव के आधार पर ली गई थी. उन्होंने कहा कि जब तक हसदेव में परियोजनाओं को रद्द नहीं किया जाता तब तक आंदोलन जारी रहेगा. उन्होंने कहा कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हसदेव अरण्य क्षेत्र में खनन से 1,70,000 हेक्टेयर जंगल नष्ट हो जाएगा और मानव-हाथी संघर्ष शुरू हो जाएगा.

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