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चिकित्सकों ने डायलिसिस रोगियों में ‘उच्च-प्रवाह फिस्टुला’ जटिलताओं के लिए किफायती समाधान विकसित किया

चंडीगढ़. चंडीगढ़ के स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थन (पीजीआईएमईआर) ने डायलिसिस के मरीजों में ‘एवी (धमनी एवं शिरा संबंधी) फिस्टुला’ की जटिलता को दूर करने के लिए एक किफायती तकनीक विकसित की है. डायलिसिस के मरीजों में उच्च-प्रवाह ‘फिस्टुला’ एक आम जटिलता है. धमनी और शिरा के बीच शल्य चिकित्सा द्वारा बनाए गए ये फिस्टुला ऐसे जोड़ होते हैं जो प्रभावी डायलिसिस के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.

हालांकि, जब फिस्टुला में प्रवाह दर अत्यधिक हो जाती है, तो इससे हृदय पर दबाव बढ़ सकता है जिसके परिणामस्वरूप हृदय काम करना बंद कर सकता है, डायलिसिस में दिक्कत आ सकती है और फिस्टुला के फटने का खतरा हो सकता है. पीजीआईएमईआर ने यहां एक बयान में कहा कि उसके द्वारा विकसित तकनीक पारंपरिक उपचारों का एक सुरक्षित, प्रभावी और किफायती विकल्प प्रदान करती है तथा नेफ्रोलॉजी (गुर्दे की कार्यप्रणाली और उन्हें प्रभावित करने वाली समस्याओं से जुड़ी चिकित्सकीय शाखा) देखभाल में एक बड़ी प्रगति को दर्शाती है. इस प्रक्रिया के लिए अस्पताल में भर्ती रहने की आवश्यकता नहीं होती.

ऐसे उच्च-प्रवाह ‘फिस्टुला’ के प्रबंधन में लगभग 50,000 रुपये का खर्च आता है, जबकि नयी विधि में लगभग 5,000 रुपये का खर्च आता है और यह अधिक व्यापक रोगी समूह के लिए सुलभ है. पीजीआईएमईआर के निदेशक प्रोफेसर विवेक लाल ने मंगलवार को कहा, ”यह अभूतपूर्व दृष्टिकोण इस बात का उदाहरण है कि कैसे अनुकूलित, किफायती समाधान रोगी प्रबंधन में क्रांति ला सकते हैं, खासकर हमारी जैसी संसाधन-सीमित परिस्थितियों में. हमें इस क्षेत्र में अग्रणी होने और डायलिसिस के अपने रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने पर गर्व है.”

पीजीआईएमईआर में नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर एच.एस. कोहली ने इस तकनीक के किफायती होने पर जोर देते हुए कहा, ”इस तकनीक का विकास एक क्रांतिकारी बदलाव साबित हुआ है.” प्रोफेसर कोहली ने कहा कि यह उच्च-प्रवाह धमनी-शिरापरक फिस्टुला के प्रबंधन के लिए एक सुरक्षित, सरल और किफायती विकल्प प्रदान करता है तथा डायलिसिस देखभाल में एक बड़ी जटिलता का सीधा समाधान करता है.

बयान में कहा गया है कि अब तक इस तरह की समस्या के प्रबंधन के लिए एंजियोग्राफी कराने, अस्पताल में भर्ती होने और कैथीटेराइजेशन लैब जैसे महंगे उपकरणों जैसी जटिल प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती थी जिनकी लागत अक्सर लगभग 50,000 रुपये होती है. इससे मरीजों एवं स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों दोनों पर वित्तीय बोझ पड़ता था. नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर मनीष राठी के नेतृत्व में और जनरल सर्जरी विभाग के डॉ. अजय सलवानिया के सहयोग से एक टीम ने एक सरल लेकिन प्रभावी तकनीक विकसित की है जिसके लिए अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं है.

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