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निर्वाचन आयोग हटाए गए 65 लाख मतदाताओं का विवरण कारण समेत प्रकाशित करे: न्यायालय

नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को बृहस्पतिवार को निर्देश दिया कि वह बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में पारर्दिशता बढ़ाने के लिए मसौदा मतदाता सूची से हटाये गये 65 लाख मतदाताओं का विवरण प्रकाशित करे और साथ ही उन्हें शामिल न करने के कारण भी बताए.

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बिहार में मतदाता सूची की एसआईआर कराने के 24 जून के निर्वाचन आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया. इसने कहा कि 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में थे, लेकिन मसौदा सूची से हटा दिए गए थे. मसौदा सूची को एक अगस्त को प्रकाशित किया गया था.

जिन लोगों की मृत्यु हो गई है, जो पलायन कर गये हैं या अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में चले गए हैं, उनके नामों की सूची पंचायत स्तर के कार्यालय और जिला स्तर के निर्वाचन अधिकारियों के कार्यालय में कारणों समेत प्रर्दिशत करने का निर्देश दिया गया. पीठ ने टेलीविजन समाचार चैनलों और रेडियो के अलावा स्थानीय भाषाओं एवं अंग्रेजी दैनिकों समेत समाचार पत्रों के माध्यम से व्यापक प्रचार करने पर जोर दिया, ताकि लोगों को उन स्थानों के बारे में जानकारी दी जा सके जहां सूची उपलब्ध होगी. शीर्ष अदालत ने कहा कि नाम हटाए जाने से जिन लोगों को दिक्कत है, उन्हें अपने आधार कार्ड के साथ निर्वाचन अधिकारियों से संपर्क करने की अनुमति दी जाती है.

पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 22 अगस्त की तारीख निर्धारित करते हुए आयोग से उसके निर्देश की अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा. निर्वाचन आयोग ने बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर महीने भर चली एसआईआर प्रक्रिया पूरी करने के बाद राज्य के लिए मतदाता सूचियों का मसौदा एक अगस्त को प्रकाशित किया था. निर्वाचन आयोग द्वारा मसौदा सूची में पहले से पंजीकृत मतदाताओं को शामिल न करने के लिए बताए गए कारणों में मृत्यु (22.34 लाख), ”स्थायी रूप से स्थानांतरित/अनुपस्थित” (36.28 लाख) और ”पहले से ही नामांकित (एक से अधिक स्थानों पर)” (7.01 लाख) शामिल थे.

निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि उसके (निर्वाचन आयोग) पास कुछ निर्णय लेने के लिए पर्याप्त शक्तियां हैं, लेकिन उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि निर्वाचन आयोग ”तीव्र राजनीतिक विद्वेष के माहौल” में काम कर रहा है, जहां उसके ज्यादातर फैसलों को चुनौती दी जाती है. उन्होंने कहा कि वर्तमान में निर्वाचन आयोग ”राजनीतिक दलों के संघर्ष के बीच फंसा हुआ है” जो हारने पर ईवीएम को ”खराब” कहते हैं और जीतने पर ईवीएम को ”अच्छा” बताते हैं. द्विवेदी ने कहा कि एक मोटे अनुमान के मुताबिक बिहार में लगभग 6.5 करोड़ लोगों को एसआईआर के लिए कोई दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि वे या उनके माता-पिता 2003 की मतदाता सूची में पंजीकृत थे. इससे पहले सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने आयोग से उन दस्तावेजों की जानकारी देने को कहा, जिन पर बिहार में 2003 के गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान विचार किया गया था.

पीठ ने कहा, ”हम चाहते हैं कि निर्वाचन आयोग बताए कि 2003 की प्रक्रिया में कौन से दस्तावेज लिये गए थे.” अदालत की यह टिप्पणी तब आई जब एक पक्ष की ओर से पेश हुए वकील निजाम पाशा ने अदालत के हवाले से कथित तौर पर कहा, ”अगर एक जनवरी, 2003 (पहले की एसआईआर की तिथि) की तारीख हटती है, तो सब कुछ खत्म हो जाएगा है.” पाशा ने कहा, ”यह बताने के लिए कुछ भी नहीं था कि यह तारीख क्यों है… यह धारणा बनाने की कोशिश की जा रही है कि यह वही तारीख है जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए गहन प्रक्रिया हुई थी. यह कहा गया है कि उस समय जारी किया गया ईपीआईसी (मतदाता) कार्ड समय-समय पर की गई संक्षिप्त कवायदों के दौरान जारी किए गए ईपीआईसी (मतदाता) कार्ड से ज्यादा विश्वसनीय है, जो गलत है.” पाशा ने पूछा कि अगर गहन और संक्षिप्त संशोधन के तहत नामांकन की प्रक्रिया एक ही है, तो संक्षिप्त प्रक्रिया के तहत जारी किए गए ईपीआईसी कार्ड कैसे रद्द किए जा सकते हैं.

वकील ने कहा कि इसलिए 2003 की तारीख अमान्य है. उन्होंने कहा, ”मेरे गणना फॉर्म की कोई रसीद या प्राप्ति की पुष्टि करने वाला कोई दस्तावेज नहीं दिया जा रहा है और इसलिए बूथ स्तर के अधिकारियों का दबदबा है और इन निचले स्तर के अधिकारियों के पास फॉर्म लेने या न लेने का बहुत ज़्यादा विवेकाधिकार है.” एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने निर्वाचन आयोग की अधिसूचना में अपर्याप्त कारणों की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया न तो ‘संक्षिप्त’ है और न ही ‘गहन’, बल्कि केवल अधिसूचना के जरिये बनाई गई एक प्रक्रिया है.

उन्होंने कहा, ”यह मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया है और इसे अयोग्य ठहराने की प्रक्रिया नहीं माना जा सकता. यह स्वागत योग्य प्रक्रिया है, (लेकिन) इसे अप्रिय प्रक्रिया में तब्दील नहीं करना चाहिए.” उच्चतम न्यायालय ने 13 अगस्त को कहा था कि मतदाता सूचियां ‘स्थिर’ नहीं रह सकतीं और उनमें संशोधन होना तय है. शीर्ष अदालत ने कहा था कि बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए स्वीकार्य पहचान दस्तावेजों की सूची को सात से बढ़ाकर 11 करना वास्तव में ‘मतदाताओं के अनुकूल है, न कि उन्हें बहिष्कृत करने वाला’.

एसआईआर पर विवाद बढ़ने पर पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग के पास उस तरह की कार्यवाही करने की शक्ति है, जैसा वह उचित समझे. पीठ ने एक याचिकाकर्ता की इस दलील से भी असहमति जताई कि विधानसभा चुनाव से पहले बिहार में मतदाता सूचियों के एसआईआर का कोई कानूनी आधार नहीं है और इसे रद्द कर दिया जाना चाहिए. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के नेताओं और गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) ने बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण की कवायद को चुनौती दी है.

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