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बांग्लादेश को धर्मनिरपेक्ष आदर्शों, धार्मिक भेदभाव में से एक को चुनना होगा: बांग्लादेशी सांसद

नयी दिल्ली. बांग्लादेशी सांसद पंकज नाथ ने रविवार को कहा कि बांग्लादेश ”अब चौराहे पर खड़ा है” और देश को यह तय करना होगा कि क्या वह अपने धर्मनिरपेक्ष आदर्शों पर लौटना चाहता है या उस रास्ते पर चलना जारी रखना चाहता है, जिससे ”धर्म के आधार पर भेदभाव और सांस्कृतिक विलुप्ति” का खतरा है. बांग्लादेश में ”हिंदू संकट” पर ह्यूमन राइट्स डिफेंस इंटरनेशनल’ (एचआरडीआई) की ओर से आयोजित एक ‘वेब कॉन्फ्रेंस’ में नाथ ने अपने देश की स्थिति को चिंताजनक बताया.

नाथ ने कहा, ”पिछले एक साल के दौरान, अत्याचारों की भयावहता वास्तव में भयावह है.” उन्होंने दावा किया कि अगस्त 2024 से हत्या, बलात्कार, भूमि हड़पने तथा हिंदू घरों, व्यवसायों और मंदिरों पर हमलों की 3,000 से अधिक घटनाएं हुई हैं. नाथ ने कहा कि बांग्लादेश अब एक चौराहे पर खड़ा है.

उन्होंने कहा, ”वह धर्मनिरपेक्ष दुनिया के उन आदर्शों की ओर लौटना चुन सकता है, जिन पर उसकी स्थापना हुई थी, या वह उस रास्ते पर चल सकता है, जिसने पहले ही अन्य देशों को धर्म के आधार पर भेदभाव और सांस्कृतिक विलुप्ति की ओर धकेल दिया है.” नाथ ने बीएनपी-जमात कार्यकर्ताओं और कट्टरपंथी समूहों पर ”सरकारी संरक्षण की आड़ में” हिंसा की साजिश रचने का आरोप लगाया, जबकि कानून प्रवर्तन एजेंसियां ”चुप” रहीं. उन्होंने कहा कि दशकों से चले आ रहे भेदभाव ने हिंदू समुदाय को राजनीतिक रूप से अदृश्य बना दिया है.

नाथ ने कहा, ”एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक आबादी के बावजूद, संसद और सरकारी निकायों में हिंदू प्रतिनिधियों का अनुपात कम रहा है.” उन्होंने कहा कि हिंदुओं के खिलाफ दंगे भड़काने के लिए मनगढ़ंत ऑनलाइन सामग्री का इस्तेमाल बढ़ रहा है. नाथ ने विशेष अल्पसंख्यक सुरक्षा अधिनियम, अल्पसंख्यक आयोग और हिंदुओं के लिए आरक्षित संसदीय सीटों सहित तत्काल संस्थागत सुधारों का आ”ान किया.

उन्होंने कहा, ”सभी सरकारी क्षेत्रों में भर्ती और सशक्तीकरण सुनिश्चित करके, हम अल्पसंख्यकों को वास्तव में सशक्त बना सकते हैं.” नाथ ने कहा, ”आज सवाल यह नहीं है कि क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यक खतरे में हैं. वे स्पष्ट रूप से खतरे में हैं. मुद्दा यह नहीं है कि क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का सफाया होगा, बल्कि यह है कि कितनी तेजी से होगा.” अन्य वक्ताओं ने भी समान चिंताएं व्यक्त कीं.

एचआरडीआई के महासचिव राजेश गोगना ने स्थिति को ”मानवाधिकार आपातकाल” बताते हुए कहा कि हिंसा की हर लहर के बाद पलायन हुआ है. उन्होंने कहा, ”जब हिंदू मंदिरों को जलाया गया और तोड़फोड़ की गई, तो पुलिसकर्मी मूकदर्शक बने रहे थे. यह प्रशासनिक चुप्पी मिलीभगत है.” ढाका विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव प्रोबीर सरकार ने देश के शैक्षणिक संस्थानों में ”संस्थागत भेदभाव” को रेखांकित किया.

उन्होंने कहा, ”2009 से पहले, हमारे विश्वविद्यालय में लगभग 50 अल्पसंख्यक शिक्षक थे. लेकिन अगस्त 2024 के बाद, हमने सैकड़ों शिक्षकों को दबाव में इस्तीफा देने के लिए मजबूर होते देखा है.” सरकार ने आगाह किया कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व में गिरावट से लोगों के हाशिये पर जाने की समस्या और बढ़ेगी.

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