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भाजपा शासित राज्यों ने विधेयकों पर न्यायालय में राज्यपाल, राष्ट्रपति की शक्तियों का बचाव किया

नयी दिल्ली. भाजपा शासित कुछ राज्यों ने अपने विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने में राज्यपालों और राष्ट्रपति की स्वायत्तता का मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में बचाव किया और कहा कि ”किसी कानून को मंजूरी अदालत द्वारा नहीं दी जा सकती.” प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने सूचित किया कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत, राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने का अधिकार केवल राज्यपालों या राष्ट्रपति के पास है तथा इसमें ”डीम्ड मंजूरी” की कोई अवधारणा नहीं है.

‘डीम्ड मंजूरी’ को कानूनी तौर पर मंजूरी या अनुमोदन माना जाता है, भले ही स्पष्ट ”हां” या औपचारिक अनुमोदन न हो. पीठ इस विषय के संबंध में राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श पर सुनवाई कर रही है कि क्या न्यायालय राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा निर्धारित कर सकता है. विभिन्न राज्य सरकारों ने दलील दी कि न्यायपालिका हर मर्ज की दवा नहीं हो सकती.

साल्वे ने दलील दी, ”न्यायालय राज्यपालों को विधेयकों पर मंजूरी देने के लिए आदेश-पत्र जारी नहीं कर सकता… किसी कानून को मंजूरी न्यायालय द्वारा नहीं दी जा सकती. किसी कानून को मंजूरी या तो राज्यपालों द्वारा या राष्ट्रपति द्वारा दी जानी चाहिए.” संविधान पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर भी शामिल हैं. आठ अप्रैल को, शीर्ष अदालत की एक अलग पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए फैसला सुनाया कि तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित और 2020 से राज्यपाल के पास लंबित 10 विधेयकों को स्वीकृत माना जाएगा.

साल्वे ने संविधान के अनुच्छेद 361 का हवाला देते हुए कहा, ”राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पद की शक्तियों और कर्तव्यों के इस्तेमाल और पालन के लिए या उन शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग और पालन के तहत किये गये या किये जाने की संभावना के उद्देश्य को लेकर किसी भी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होंगे.” उन्होंने कहा कि न्यायालय केवल राज्यपालों या राष्ट्रपति द्वारा लिये गए निर्णयों की पड़ताल कर सकता है और इनमें प्रस्तावित निर्णय भी शामिल हैं.

साल्वे ने कहा, ”न्यायालय केवल यह पूछ सकता है कि आपका निर्णय क्या है, लेकिन न्यायालय यह नहीं पूछ सकता कि आपने निर्णय क्यों लिया है.” उत्तर प्रदेश और ओडिशा की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल को फैसले लेने की स्वायत्तता प्राप्त है और उन्हें स्वीकृति देने से पहले पूर्ण विवेकाधिकार प्राप्त है.

नटराज ने कहा, ”जब भाषा और अनुच्छेद स्पष्ट हैं, तो हमें ‘कैसियस ओमिसस’ (ऐसी स्थिति जो कानून के अंतर्गत नहीं आती) नहीं बताना चाहिए.” उन्होंने कहा कि अदालतें राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए समय-सीमा निर्धारित नहीं कर सकतीं. गोवा की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत, राज्यपाल की मंजूरी के बिना कोई भी प्रक्रिया पूरी नहीं होती, इसलिए ‘डीम्ड मंजूरी’ नहीं हो सकती.

उन्होंने कहा, “संविधान में ‘डीम्ड मंजूरी’ की अवधारणा नहीं है और न्यायपालिका विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को ‘डीम्ड मंजूरी’ नहीं दे सकती.” न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि ‘डीम्ड मंजूरी’ केवल एक कल्पना है, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है, लेकिन फिर भी किसी स्थिति में इसकी कल्पना की जा सकती है. बनर्जी ने कहा कि ब्रिटिश संविधान में ”डीम्ड मंजूरी” की चर्चा थी, जबकि भारतीय संविधान में ऐसा कुछ भी नहीं है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि संविधान के कुछ प्रावधानों में स्पष्ट रूप से कार्रवाई का प्रावधान है, खासकर जहां समय-सीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई है.

मेहता ने अनुच्छेद 198 (5) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि यदि राज्य विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक विधानपरिषद को उसकी सिफारिशों के लिए भेजा जाता है और 14 दिनों की उक्त अवधि के भीतर विधानपरिषद को वापस नहीं किया जाता है, तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाएगा. छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने दलील दी कि 8 अप्रैल के फैसले में कुछ ऐसा जोड़ा गया है जो अनुच्छेद 200 में नहीं था.

इससे पहले, साल्वे ने राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों में अंतर बताते हुए कहा कि राष्ट्रपति केवल केंद्र सरकार की सहायता और सलाह पर कार्य करते हैं, जबकि राज्यपालों के पास व्यापक शक्तियां हैं, जिनमें मंजूरी रोकने का अधिकार भी शामिल है. उन्होंने कहा, ”भारतीय संघवाद की यह विशेषता नहीं है कि किसी प्रस्ताव को स्वीकृति देने से पहले कई दौर की विचार-विमर्श (सलाह-मशविरा) आवश्यक हो. हमारा संघवाद सीमित स्वरूप का है, जिसमें यह आशा की जाती है कि सभी संवैधानिक पदाधिकारी विवेक के साथ कार्य करेंगे.” उन्होंने कहा कि राज्यपाल की शक्ति न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आती.

वरिष्ठ अधिवक्ता ने विधेयकों के संबंध में राज्यपालों की शक्तियों से संबंधित अनुच्छेद 200 का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रावधान राज्यपाल के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं करता है. उन्होंने कहा कि विधेयकों का पारित होना भी राजनीतिक विचार-विमर्श पर आधारित होता है और कभी-कभी इस प्रक्रिया में 15 दिन और कभी-कभी छह महीने लग सकते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले किसी गुप्त स्थान पर बैठकर नहीं लिये जाते. साल्वे ने कहा कि एक बार जब संवैधानिक ढांचा शक्तियों का निर्धारण कर देता है तो तो उन अधिकारों का प्रयोग करने वाले उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत नहीं आते.

साल्वे ने यह भी कहा, ”जब तक राज्यपाल को जवाबदेह नहीं बनाया जाता, तब तक (किसी विधेयक को स्वीकृति न देने के) निर्णय की वैधता की जांच का कोई उपाय नहीं है, और इसका अर्थ है कि न्यायालय के लिए उसकी समीक्षा कर पाना संभव नहीं है.” उन्होंने यह भी कहा कि विधेयक को मंजूरी रोकने का राज्यपाल का अधिकार संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त है, हालांकि “वीटो” शब्द का प्रयोग भ्रामक होगा.

उन्होंने कहा, ”इसे वीटो कहना एक अनुचित विशेषता है… लेकिन हां, राज्यपाल के पास मंजूरी न देने का अधिकार है. यह अनुच्छेद 200 में निहित है और अनुच्छेद 201 के अनुरूप है, जो केंद्र को विधेयक की मंजूरी देने से रोकने की अनुमति देता है, भले ही विधेयक राज्य सूची में क्यों न हो.” वरिष्ठ अधिवक्ता एन के कौल, मनिंदर सिंह, विनय नवरे और गुरु कृष्णकुमार ने विभिन्न भाजपा शासित राज्यों की ओर से राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों के समर्थन में दलीलें पेश कीं.

तमिलनाडु और केरल को 28 अगस्त को दलीलें पेश करनी हैं और 8 अप्रैल के फैसले का बचाव करना है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए शीर्ष अदालत से मई में यह जानने का प्रयास किया था कि क्या न्यायिक आदेश राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार के प्रयोग के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकते हैं. राष्ट्रपति का यह निर्णय तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित विधेयकों से निपटने में राज्यपाल की शक्तियों पर उच्चतम न्यायालय के 8 अप्रैल के फैसले के आलोक में आया था.

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