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हत्या मामला: न्यायालय ने पहलवान सुशील कुमार की जमानत रद्द की, आत्मसमर्पण करने का निर्देश

नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी के छत्रसाल स्टेडियम में 2021 में पूर्व जूनियर राष्ट्रीय कुश्ती चैंपियन सागर धनखड़ की हत्या के मामले में ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार को मिली जमानत बुधवार को रद्द कर दी. न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने प्राथमिकी में लगाए गए उन आरोपों का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रीय राजधानी को बदला चुकाने के लिए ”अपराधिक अखाड़ा” बना दिया गया और कानून की कोई परवाह नहीं की गई. अदालत ने कुमार को एक सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया.

पीठ दिल्ली उच्च न्यायालय के चार मार्च के जमानत आदेश के खिलाफ धनखड़ के पिता द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी. कुमार और अन्य पर एक कथित संपत्ति विवाद को लेकर मई 2021 में धनखड़ पर जानलेवा हमला करने और उनके दो मित्रों को घायल करने का आरोप है. पीठ ने कहा, ”निस्संदेह, आरोपी (कुमार) एक जानेमाने पहलवान और ओलंपियन हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व किया है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनका सामाजिक प्रभाव है.” हालांकि, फैसले में कहा गया कि गवाहों पर उनके “प्रभाव” या मुकदमे की कार्यवाही विलंबित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

गवाहों पर दबाव डालने से संबंधित आरोप जमानत आदेश पारित होने से पहले लगाए गए थे और कुछ गवाहों ने कुमार के इशारे पर अपनी जान को खतरा होने की आशंका जताते हुए लिखित रूप में शिकायत दर्ज करायी थी. पीठ ने उल्लेख किया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद कुमार फरार रहे और गिरफ्तारी से बचते रहे. उन्हें अंतत? 23 मई 2021 को गिरफ्तार किया गया.

पीठ ने कहा, ”अदालत को आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की गंभीरता से भी अवगत रहना चाहिए.” उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आरोपियों ने कथित तौर पर कुछ लोगों का अपहरण किया, उन पर खतरनाक हथियारों से हमला किया और गंभीर चोटें पहुंचाईं, जिसके परिणामस्वरूप पीड़ित की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु हो गई. अभियोजन पक्ष ने रिकॉर्ड में यह भी दर्ज किया कि जब भी कुमार को पांच अवसरों पर अस्थायी जमानत दी गई, तो गवाही के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाह साफ तौर पर मुकर गए.

पीठ ने कहा, ”हालांकि, इस चरण में हम उस पर अपनी मुहर लगाने से परहेज करते हैं, लेकिन उल्लेखनीय है कि यह स्वरूप इस संभावना को रेखांकित करता है कि आरोपी मुकदमे में हस्तक्षेप कर सकता है. गौर करने वाली बात है कि दर्ज बयान वाले 35 गवाहों में से 28 मुकर गए हैं.” उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जमानत देना एक विवेकाधीन न्यायिक उपाय है, जिसमें कानूनी और सामाजिक हितों के बीच सूक्ष्म और संदर्भ-संवेदनशील संतुलन बनाना आवश्यक होता है.

पीठ ने कहा, ”एक ओर आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना आवश्यक है, दूसरी ओर, अदालत को कथित अपराध की गंभीरता, आरोपी की रिहाई के व्यापक सामाजिक प्रभाव और जांच एवं सुनवाई की निष्पक्षता और शुचिता बनाए रखने की आवश्यकता के प्रति भी समान रूप से सचेत रहना चाहिए.” उच्चतम न्यायालय ने जमानत मामलों में न्यायिक विवेक का प्रयोग करते समय आरोप के स्वरूप और गंभीरता, प्रथम दृष्टया मामले की मजबूती, फरार होने का जोखिम या सबूत अथवा गवाहों के साथ छेड़छाड़ की संभावना के साथ-साथ ”सर्वोपरि हित” यानी यह सुनिश्चित करना कि मुकदमा प्रभावित न हो, इन सभी का संतुलित आकलन करने पर जोर दिया.

मुद्दे पर दिए गए पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि जमानत देने के खिलाफ अपील को जमानत रद्द करने की अर्जी के समान नहीं माना जा सकता. पीठ ने कहा, ”जमानत देने के खिलाफ अपील को प्रतिशोधात्मक उपाय के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.” अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपराध की गंभीर प्रकृति, आरोपी द्वारा मुकदमे को प्रभावित करने की आशंका और जांच के दौरान उसके आचरण पर विचार न करके ”गलत तरीके” से कुमार को जमानत दी थी.

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल जमानत देने के आदेश की पड़ताल के लिए हैं और इन्हें मामले के गुण-दोष पर राय के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए. शीर्ष अदालत ने कहा कि परिस्थितियों में बदलाव होने पर कुमार को दोबारा जमानत के लिए आवेदन करने की छूट होगी. अधीनस्थ अदालत ने अक्टूबर 2022 में कुमार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत हत्या सहित विभिन्न आरोप तय किए थे, साथ ही हथियार कानून और अन्य धाराओं के तहत भी आरोप लगाए थे.

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