भागवत का उद्बोधन प्रेरक है : प्रधानमंत्री मोदी

नयी दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बृहस्पतिवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के वार्षिक विजयादशमी संबोधन की सराहना करते हुए इसे प्रेरणादायक बताया और कहा कि उन्होंने भारत की नयी ऊंचाइयों को छूने की अंर्तिनहित क्षमता को उजागर किया.
मोदी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा, ”परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अपने प्रेरक उद्बोधन में राष्ट्र निर्माण में संघ के अतुलनीय योगदान पर प्रकाश डाला है. उन्होंने भारतवर्ष के उस सामर्थ्य को भी रेखांकित किया है, जो देश को सशक्त बनाने के साथ-साथ संपूर्ण मानवता के लिए भी कल्याणकारी है. मोदी 1980 के दशक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने से पहले आरएसएस के प्रचारक थे.
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि हिंदू समाज की शक्ति और चरित्र एकता की गारंटी देते हैं. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हिंदू समाज में ”हम और वे” की अवधारणा कभी अस्तित्व में नहीं रही. उन्होंने ‘स्वदेशी’ (देशीय संसाधनों का उपयोग) और ‘स्वावलंबन’ (आत्मनिर्भरता) का समर्थन करते हुए कहा कि पहलगाम हमले के बाद विभिन्न देशों द्वारा अपनाए गए रुख से भारत के साथ उनकी मित्रता के स्वरूप और प्रगाढ़ता का पता चला.
आरएसएस की स्थापना 1925 में दशहरा के दिन नागपुर में महाराष्ट्र के चिकित्सक केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी. इस विजयादशमी उत्सव के साथ आरएसएस अपना शताब्दी वर्ष भी मना रहा है. कुछ लोगों से शुरू हुआ यह संगठन आज देश का सबसे व्यापक गैर-सरकारी संगठन बन गया है. भाजपा वैचारिक रूप से इस हिंदुत्ववादी संगठन से प्रेरित है.
आरएसएस धर्म, जाति के भेदभाव के बिना सभी को गले लगाता है : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन
उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने पर बृहस्पतिवार को कहा कि यह संगठन धर्म, जाति या भाषा के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी को गले लगाता है और यह विविधता में एकता का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि इस ”समावेशी दृष्टिकोण” ने आरएसएस और उसके संबद्ध संगठनों को स्थायी रूप से सफल बनाया है, जिससे राष्ट्र की सर्वांगीण प्रगति हुई है.
राधाकृष्णन ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि विश्व का सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त संगठन 100 वर्ष का हो चुका है. संघ का सबसे बड़ा योगदान ऐसे आत्मानुशासित और उत्तरदायी नागरिक हैं, जो सशक्त समाज की आधारशिला हैं. उन्होंने कहा कि 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार जी द्वारा स्थापित किए जाने के बाद से, संघ ने युवाओं को मजबूत आंतरिक चरित्र निर्माण और निस्वार्थ भाव से समाज सेवा करने के लिए प्रेरित किया है.
उपराष्ट्रपति ने कहा कि ‘सेवा परमो धर्म?’ के आदर्श से प्रेरित स्वयंसेवकों को चाहे बाढ़, अकाल, भूकंप या अन्य किसी भी आपदा का सामना करना पड़े, वे बिना किसी अपेक्षा या आदेश की प्रतीक्षा के, संगठित होकर पीड़ितों की सेवा करते हैं. उन्होंने कहा, ”यह निस्वार्थ सेवा राष्ट्र के लिए एक अद्वितीय और अमूल्य उपहार है.” उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सेवा करते हुए कभी धर्म, जाति या भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं करता. उन्होंने कहा कि वह दिन दूर नहीं, जब भारत विश्व की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित होगा.
उपराष्ट्रपति ने कहा, ”इस महान यात्रा में संघ की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है और समय के साथ उसकी यह प्रेरक भूमिका निरंतर बनी रहेगी.” उन्होंने कहा, ”संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर मैं समाज की सेवा में उसके निरंतर योगदान और राष्ट्रीय एकता, सद्भाव और प्रगति के महान उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं.”
अमित शाह ने ‘राष्ट्र निर्माण’ में योगदान देने और नेताओं को ”गढ़ने” के लिए आरएसएस की सराहना की
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बृहस्पतिवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष पर उसकी सराहना करते हुए कहा कि संगठन के कार्यकर्ता हमेशा से ही सभी सुख-सुविधाओं का त्याग कर राष्ट्र की सेवा और सुरक्षा के लिए सर्मिपत रहे हैं. शाह ने खुद को ”गौरवान्वित स्वयंसेवक” बताते हुए कहा कि शीर्ष नेताओं से लेकर जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक, संघ ने अपनी स्थापना के इन 100 वर्षों में कई व्यक्तित्वों को गढ़ा है.
उन्होंने अपने संदेश में कहा, ”विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की शताब्दी वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं. संघ शताब्दी की इस विशाल यात्रा में मां भारती की सेवा, सुरक्षा और संवेदना के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देने वाले आरएसएस के सभी साधकों को नमन करता हूं.” गृह मंत्री ने कहा कि सभी सुख-वैभव को त्यागकर एक स्वयंसेवक और प्रचारक के रूप में पूरा जीवन राष्ट्रसेवा के लिए सर्मिपत कर देना आसान नहीं है. उन्होंने कहा, ”100 वर्षों में संघ के असंख्य स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने त्याग और समर्पण से इसे सिद्ध कर दिखाया है.” शाह ने कहा कि केशव बलिराम हेडगेवार के नेतृत्व में 1925 में नागपुर में विजयादशमी के दिन कुछ लोगों के साथ शुरू हुआ संघ ”आज राष्ट्र के प्रति समर्पण और संगठन कौशल के दम पर दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन बन गया” है.
उन्होंने कहा, ”मुझे गर्व है कि मैं भी एक स्वयंसेवक हूं.” शाह ने कहा कि देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन नेताओं से लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं तक, संघ शताब्दी की ऐतिहासिक यात्रा ने अनेक ऐसे व्यक्तित्व गढ़े हैं, जिनके जीवन का लक्ष्य ही राष्ट्रनिर्माण रहा है.
उन्होंने कहा, ”हैदराबाद मुक्ति संग्राम हो, आपातकाल का प्रतिकार हो, गोवा मुक्ति आन्दोलन हो, युद्धों में वीर जवानों की सहायता हो, धारा 370 का विरोध हो, पूर्वोत्तर में घुसपैठिया विरोधी आंदोलन हो, स्वयंसेवकों ने राष्ट्रनिर्माण के कार्यों को त्याग और समर्पण से नयी ऊंचाई दी है.”
शाह ने कहा, ”मरुभूमि हो या बीहड़ जंगल, हिमालय की दुर्गम चोटियां हों या सुदूर देहात, संघ ने हर जगह ‘महामंगले पुण्यभूमे’ के प्रति निष्ठा और सेवा का ध्वज लहराया. वनवासियों, पिछड़ों, दलितों, वंचितों और देश के सभी वर्गों को एकता के सूत्र में पिरोकर आत्मगौरव से युक्त राष्ट्र की संकल्पना में अर्हिनश योगदान देने वाली संघ शताब्दी की यह यात्रा इतिहास में ्स्विवणम अक्षरों में लिखी जाएगी.”

