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देश भर के दीवानी न्यायाधीशों के करियर में धीमी प्रगति के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई शुरू

नयी दिल्ली: प्रवेश स्तर के न्यायिक अधिकारियों के करियर में धीमी गति से प्रगति होने से ंिचतित उच्चतम न्यायालय ने उच्च जिला न्यायिक सेवाओं के संवर्ग में वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए राष्ट्रव्यापी मानदंड तैयार करने के काफी समय से लंबित मुद्दे पर मंगलवार को सुनवाई शुरू की।

भारत के प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस स्थिति पर गौर किया कि ‘‘अधिकतर राज्यों में दीवानी न्यायाधीश (सीजे) के रूप में भर्ती होने वाले न्यायिक अधिकारी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद तक पहुंचना तो दूर, प्रधान जिला न्यायाधीश (पीडीजे) के स्तर तक भी अक्सर नहीं पहुंच पाते। इसके परिणामस्वरूप कई प्रतिभाशाली युवा वकील सीजे के स्तर की सेवा में शामिल नहीं होते।’’

संविधान पीठ में न्यायमूर्ति गवई के अलावा न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। पीठ ने 14 अक्टूबर को यह प्रश्न तैयार किया था- ‘‘उच्च न्यायिक सेवाओं के संवर्ग में वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए क्या मानदंड होना चाहिए?’’ पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्य मुद्दे पर सुनवाई करते समय वह ‘‘अन्य सहायक या संबंधित मुद्दों’’ पर भी विचार कर सकती है।

देश भर के न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता और करियर में प्रगति का मुद्दा 1989 में अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ (एआईजेए) द्वारा दायर एक याचिका में उठाया गया था। अधीनस्थ न्यायपालिका की सेवा शर्तों को आकार देने वाले कई ऐतिहासिक फैसले लंबित याचिका में पारित किए गए हैं।

एआईजेए की तीन दशक से भी पहले दायर की गई मूल याचिका में देश भर के न्यायिक अधिकारियों के वेतनमान, सेवा शर्तों और करियर की प्रगति में एकरूपता की मांग की गई थी। यह मामला समय के साथ अधीनस्थ न्यायपालिका में सुधार और भर्ती एवं पदोन्नति ढांचे में सुधार के उद्देश्य से शीर्ष अदालत द्वारा निर्देश जारी करने का केंद्रीय मंच बन गया है।

वर्तमान मुद्दे को वरिष्ठ अधिवक्ता एवं न्यायमित्र सिद्धार्थ भटनागर द्वारा विचारार्थ लाया गया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दीवानी न्यायाधीश के रूप में भर्ती किए गए न्यायिक अधिकारी शायद ही कभी प्रधान जिला न्यायाधीश या उससे आगे के पद तक पहुंच पाते हैं, जबकि जिला न्यायाधीश के रूप में सीधे भर्ती किए गए अधिकारियों का अक्सर उच्च पदों पर वर्चस्व रहता है।

न्यायमित्र ने कहा कि इस असमानता ने प्रतिभाशाली युवा वकीलों को अधीनस्थ न्यायिक सेवा के माध्यम से न्यायपालिका में शामिल होने से हतोत्साहित किया है। पीठ ने 14 अक्टूबर को कहा था कि वह देश भर के अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के सामने आने वाले करियर में ठहराव से संबंधित मुद्दों पर सुनवाई 28 अक्टूबर से शुरू करेगी।

पीठ ने इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षों से नोडल वकील नियुक्त किए थे। उसने कहा था कि जो पक्ष इस प्रस्ताव का समर्थन करते हैं कि प्रधान जिला न्यायाधीशों के संवर्ग में कुछ प्रतिशत सीट दीवानी न्यायाधीश/न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में सेवा में शामिल हुए न्यायाधीशों के लिए आरक्षित होनी चाहिए, वे 28 अक्टूबर को अपनी दलीलें पेश करेंगे और जो पक्ष इसका विरोध करते हैं, वे 29 अक्टूबर को अपनी दलीलें पेश करेंगे।

भटनागर ने कहा था कि वह इस तर्क का समर्थन करते हैं कि न्यायिक मजिस्ट्रेट या दीवानी न्यायाधीश संवर्ग से आरंभ में चयनित न्यायाधीशों की पदोन्नति के लिए प्रधान जिला न्यायाधीशों के संवर्ग से कुछ पद आरक्षित किए जाने की आवश्यकता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने कहा था कि दिल्ली न्यायिक सेवा में बहुत कम न्यायिक अधिकारी जिला न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत होते हैं और उन्होंने दिल्ली न्यायपालिका के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 13 प्रमुख जिला न्यायाधीशों में से दो सीधे नियुक्त होते हैं जबकि 11 पदोन्नत अधिकारी होते हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बसंत ने दलील दी थी कि क्या पांच न्यायाधीशों की पीठ पर्याप्त होगी क्योंकि पांच न्यायाधीशों की दो पीठों के फैसले में यह माना गया है कि एक एकीकृत सेवा में बाद में विभाजन संभव नहीं हो सकता है। उन्होंने दलील दी थी कि इस अदालत ने माना है कि जब संवर्गों की दो अलग-अलग धाराएं एक में विलीन हो जाती हैं तो मूल स्रोत का कोई मतलब नहीं रह जाता और इसलिए कोई आरक्षण नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस अदालत को पहले यह तय करना चाहिए कि क्या इस मुद्दे की सुनवाई एक बड़ी पीठ द्वारा की जानी चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि अदालत अगली सुनवाई की तारीख पर इस मामले को एक बड़ी पीठ को सौंपे जाने के मुद्दे पर भी विचार करेगी। उच्चतम न्यायालय ने देश भर की अधीनस्थ अदालतों के न्यायिक अधिकारियों के करियर में ठहराव से जुड़े मुद्दों को सात अक्टूबर को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंपा था।

इससे पूर्व, प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि न्यायपालिका में प्रवेश स्तर के पदों पर शामिल होने वालों के लिए उपलब्ध पदोन्नति के सीमित अवसरों पर ध्यान देने के लिए एक व्यापक समाधान की आवश्यकता है। न्यायालय ने कहा था कि इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय द्वारा पहले जारी किए गए नोटिसों के जवाब में कई उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों ने अलग-अलग विचार व्यक्त किए थे।

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