जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का निधन, अंतिम संस्कार बुधवार को दिल्ली में
सत्यपाल मलिक का राजनीतिक सफर: वफादार से विवादास्पद आलोचक तक
नयी दिल्ली. जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का लंबी बीमारी के बाद मंगलवार को यहां एक अस्पताल में निधन हो गया. वह 79 वर्ष के थे. मलिक के निजी स्टाफ ने मंगलवार को यह जानकारी दी. उनका अंतिम संस्कार बुधवार अपराह्न चार बजे लोदी रोड स्थित श्मशान घाट में होगा.
अपने लंबे राजनीतिक जीवन में लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहने के अलावा गोवा, बिहार, मेघालय और ओडिशा के राज्यपाल के पदों पर रहे मलिक का अपराह्न एक बजकर 12 मिनट पर यहां राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल में निधन हो गया.
उनके स्टाफ ने बताया कि वह लंबे समय से अस्पताल की गहन देखभाल इकाई (आईसीयू) में थे और उनका विभिन्न बीमारियों का इलाज किया जा रहा था.
आरएमएल अधिकारियों ने एक बयान में कहा, ”गहरे दुख के साथ, हम सत्यपाल मलिक के निधन की पुष्टि करते हैं. उनका हमारे अस्पताल की गहन देखभाल इकाई में इलाज किया जा रहा था.” उन्होंने बताया कि मलिक मधुमेह, गुर्दे की बीमारी, उच्च रक्तचाप और मोटापा एवं नींद में रुकावट जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से लंबे समय से जूझ रहे थे.
जम्मू कश्मीर के राज्यपाल के तौर पर मलिक के कार्यकाल के दौरान ही पांच अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को निरस्त कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया था. संयोग से, उन्होंने केंद्र के इस कदम के छह साल पूरे होने के दिन अंतिम सांस ली. मलिक ने यह आरोप लगाकर विवाद पैदा कर दिया था कि उन्हें जम्मू-कश्मीर में दो प्रमुख परियोजनाओं की फाइल को मंजूरी देने के लिए रिश्वत की पेशकश की गई थी. उन्होंने किसानों और पुलवामा आतंकवादी हमले सहित अन्य मुद्दों पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर सवाल उठाए थे.
मलिक द्वारा उठाए गए दो मुद्दों की जांच कर रहे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने इस साल मई में 2,200 करोड़ रुपये की किरू जलविद्युत परियोजना से संबंधित एक मामले में उनके खिलाफ आरोप-पत्र दायर किया था. अस्पताल के बयान के अनुसार, मलिक को 11 मई को दोपहर 12 बजकर चार मिनट पर जटिल मूत्रमार्ग संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था. इसके बाद उन्हें मूत्रमार्ग संक्रमण, अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान हुए निमोनिया और कई अंगों के काम न करने के कारण ‘रिफ्रैक्टरी सेप्टिक शॉक’ हो गया. ‘सेप्टिक शॉक’ ऐसी खतरनाक स्थिति होती है, जिसमें मरीज के कई अंग एक साथ क्षतिग्रस्त हो जाते हैं.
बयान में कहा गया, ”वेंटिलेटर सपोर्ट और गहन देखभाल प्रबंधन एवं कई एंटीबायोटिक दवाओं समेत सभी उचित एवं गहन चिकित्सकीय मदद दिए जाने के बावजूद मलिक की हालत लगातार बिगड़ती रही.” बयान में कहा गया, ”मलिक को गुर्दे संबंधी गंभीर रोग के साथ-साथ ‘डिसेमिनेटेड इंट्रावैस्कुलर कोएगुलेशन’ (छोटी नसों में खून के छोटे-छोटे थक्के बनना) की समस्या भी हो गई थी, जिसके कारण उन्हें कई बार ‘हेमोडायलिसिस’ कराना पड़ा. मलिक का पांच अगस्त 2025 को अपराह्न एक बजकर 12 मिनट पर निधन हो गया.” मलिक का अंतिम संस्कार बुधवार अपराह्न चार बजे राष्ट्रीय राजधानी के लोधी रोड स्थित श्मशान घाट पर किया जाएगा.
सत्यपाल मलिक का राजनीतिक सफर: वफादार से विवादास्पद आलोचक तक
अनुभवी नेता सत्यपाल मलिक का पांच दशक लंबा राजनीतिक करियर कई राजनीतिक दलों से गुजरा और वह इस दौरान कई उच्च-स्तरीय संवैधानिक पदों पर भी रहे जिसके बाद वह उसी सत्ता प्रतिष्ठान के मुखर आलोचक बन गए जिसकी उन्होंने सेवा की थी. उन्होंने चार राज्यों – बिहार (2017), जम्मू और कश्मीर (2018), गोवा (2019) और मेघालय (2020) के राज्यपाल के रूप में कार्य किया. लेकिन उनका सबसे प्रभावशाली कार्यकाल अगस्त 2018 में शुरू हुआ, जब उन्हें जम्मू और कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
इस कार्यकाल में दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं . पहला, 2019 का पुलवामा आतंकवादी हमला जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए तथा दूसरा, पांच अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बना दिया गया तथा तत्कालीन राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों–जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दिया. मलिक जम्मू-कश्मीर राज्य के अंतिम राज्यपाल थे. मलिक (79) कुछ समय से यहां एक अस्पताल में भर्ती थे और मंगलवार को उनका निधन हो गया. वर्ष 2019 में आज के ही दिन अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाया गया था.
यद्यपि वह भाजपा में एक वफादार के रूप में प्रमुखता से उभरे, लेकिन हाल के वर्षों में उनकी पहचान केंद्र सरकार की नीतियों के मुखर आलोचक के रूप में होने लगी थी, जिससे उनकी सार्वजनिक छवि एक अनुभवी प्रशासक से एक मुखर असंतुष्ट की बन गई थी.
जम्मू-कश्मीर से उन्हें गोवा स्थानांतरित कर दिया गया था, जहां राज्य सरकार के साथ उनके रिश्ते खराब हो गए क्योंकि उन्होंने कोविड-19 से निपटने के उनके प्रयासों की खुलेआम आलोचना की और उस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया. गोवा से उन्हें मेघालय भेज दिया गया जो बतौर राज्यपाल उनका अंतिम कार्यभार था.
राज्यपाल पद से सेवानिवृत्त होने पर, उन्होंने महत्वपूर्ण मामलों पर सार्वजनिक रूप से केंद्र सरकार की आलोचना की. उन्होंने यह भी कहा था कि पुलवामा हमला सरकारी उदासीनता का परिणाम था. उन्होंने तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के विरोध का मुखर समर्थन किया. उनका तर्क था कि केंद्र सरकार ने उनकी (किसानों की) बात नहीं सुनी.
अपने जीवन के अंतिम दिनों में, मलिक का नाम इस साल मई में दाखिल किये गये सीबीआई के आरोपपत्रों में भी शामिल था, जो 2,200 करोड़ रुपये की कीरू जलविद्युत परियोजना में कथित भ्रष्टाचार के सिलसिले में थे. उन्होंने अस्पताल के बिस्तर से ही इन आरोपों का पुरजोर खंडन किया और इसे ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ बताया था. मलिक का जन्म 24 जुलाई, 1946 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसावदा गांव में हुआ था.
उनकी राजनीतिक यात्रा समाजवादी विचारधारा वाले एक छात्र नेता के रूप में शुरू हुई, लेकिन बाद में उनका राजनीतिक जीवन कई दलों में बदलता रहा. वह भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) से कांग्रेस में चले गये, फिर जनता दल और अंतत? भाजपा में शामिल हो गए.
जाट नेता मलिक पहली बार 1974 में चरण सिंह की बीकेडी से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए थे.
मलिक दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए – 1980 से 1986 तक और फिर 1986 से 1989 तक . फिर उन्होंने जनता दल के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया. वह अलीगढ़ संसदीय सीट से जीत हासिल कर लोकसभा पहुंचे. तत्कालीन वी पी सिंह सरकार ने उन्हें संसदीय कार्य और पर्यटन राज्य मंत्री नियुक्त किया. वी पी सिंह सरकार के गिर जाने और उसके बाद जनता दल में उथल-पुथल होने के बाद, मलिक भाजपा में शामिल हो गए. भाजपा में वह पार्टी उपाध्यक्ष बने और किसान मोर्चा (किसान प्रकोष्ठ) के प्रभारी के रूप में भी कार्य किया.
