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राज्य बार काउंसिल और बीसीआई विधि स्रातकों से ‘वैकल्पिक’ शुल्क नहीं ले सकते: उच्चतम न्यायालय

नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वकीलों के रूप में नामांकन कराने वाले विधि स्रातकों से राज्य बार काउंसिल या ‘बार काउंसिल आॅफ इंडिया’ द्वारा वैधानिक शुल्क के अलावा कोई अन्य ‘वैकल्पिक’ शुल्क नहीं वसूला जा सकता।

शीर्ष अदालत ने इसी के साथ कर्नाटक राज्य बार काउंसिल से ऐसी कोई भी राशि वसूलना बंद करने को कहा है।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने के. एल. जे. ए. किरण बाबू की एक अवमानना याचिका पर यह निर्देश दिया।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य बार काउंसिल, विशेषकर कर्नाटक राज्य बार काउंसिल द्वारा विधि स्रातकों से नामांकन के लिए अत्यधिक शुल्क नहीं लेने के इस न्यायालय के पिछले साल जुलाई के निर्देशों का अक्षरश? पालन नहीं किया जा रहा है।

‘बार काउंसिल आॅफ इंडिया’ ने अपने हलफनामे में कहा कि सभी राज्य बार काउंसिल उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन कर रही हैं और कर्नाटक राज्य बार काउंसिल द्वारा पहचान पत्र, प्रमाण पत्र, कल्याण निधि और प्रशिक्षण आदि के लिए 6,800 रुपये की फीस ली जाती है तथा वैधानिक शुल्क के अतिरिक्त 25,000 रुपये वैकल्पिक हैं, अनिवार्य नहीं।

पीठ ने चार अगस्त के अपने आदेश में कहा, ‘‘हम यह स्पष्ट करते हैं कि वैकल्पिक जैसा कुछ नहीं है। कोई भी राज्य बार काउंसिल या बार काउंसिल आॅफ इंडिया कोई भी राशि ‘वैकल्पिक’ के तौर पर नहीं वसूलेंगे। उन्हें मुख्य फैसले में इस अदालत द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार ही फीस वसूलनी होगी।’’ शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि कर्नाटक राज्य बार काउंसिल वैकल्पिक रूप से कोई राशि वसूल रही है, हालांकि यह अनिवार्य नहीं है, तो भी इसे रोका जाना चाहिए।

पिछले साल 30 जुलाई को शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि राज्य बार काउंसिल विधि स्रातकों को वकील के रूप में नामांकित करने के लिए अत्यधिक शुल्क नहीं ले सकतीं, क्योंकि यह हाशिए पर पड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के खिलाफ प्रणालीगत भेदभाव को बढ़ावा देता है एवं कानूनी पेशे में उनकी भागीदारी को कमजोर भी करता है।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि कुछ राज्य बार काउंसिल (एसबीसी) द्वारा 15,000 रुपये से लेकर 40,000 रुपये तक की अत्यधिक फीस वसूलना ‘‘मूल समानता के सिद्धांत के विपरीत’’ है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि एसबीसी और बार काउंसिल आॅफ इंडिया (बीसीआई) संसद द्वारा निर्धारित राजकोषीय नीति में ‘‘परिवर्तन या संशोधन’’ नहीं कर सकते।

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