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राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक पारित होने से महत्वपूर्ण सुधार हासिल: मांडविया

भारत के ऐतिहासिक खेल विधेयक ने कैसे आकार लिया

नयी दिल्ली. खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने मंगलवार को कहा कि संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक के पारित होने से भारत के खेल परिदृश्य में बदलाव आएगा और निर्णय प्रक्रिया खिलाड़ी केंद्रित होगी. लोकसभा से मंजूरी मिलने के एक दिन बाद राज्यसभा में विधेयक पारित होने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए मांडविया ने कहा कि सरकार अब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार सुनिश्चित करने के लिए पदक रणनीति बनाने पर ध्यान केंद्रित करेगी.

मांडविया ने कहा, ”इस सुधार से देश का खेल क्षेत्र बदलेगा. दुनिया के 20 देशों के पास खेल कानून हैं और भारत अब उनके बराबर होगा.” उन्होंने कहा, ”आने वाले दिनों में हम अपनी पदक तालिका रणनीति तैयार करेंगे जिसके आधार पर अगले 10 वर्षों में हम विश्व स्तर पर शीर्ष स्थान पर होंगे.” एक अरब से अधिक की आबादी वाले देश भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ ओलंपिक प्रदर्शन 2021 तोक्यो खेलों में हासिल किए गए सात पदक हैं जिसमें भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा एकमात्र स्वर्ण पदक विजेता रहे थे.
निचले सदन में तेजी से पारित होने के बाद खेल विधेयक पर राज्यसभा में दो घंटे से अधिक समय तक चर्चा हुई.

खेल विधेयक की तीन महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं. राष्ट्रीय खेल बोर्ड, जिसके पास राष्ट्रीय खेल महासंघों को मान्यता देने और उनकी मान्यता रद्द करने का अधिकार होगा. विवादों के त्वरित समाधान के लिए राष्ट्रीय खेल पंचाट और महासंघों के चुनावों की निगरानी के लिए राष्ट्रीय खेल चुनाव पैनल (एनएसईपी) होगा.

इसके अलावा इसमें महासंघों में महिलाओं और खिलाड़ियों के अनिवार्य प्रतिनिधित्व का प्रावधान भी है. मांडविया ने कहा, ”खेल क्षेत्र में सुशासन लाने के लिए राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक पहले लोकसभा में और आज राज्यसभा में पारित किया गया. खेल प्रशासन विधेयक के माध्यम से देश में खिलाड़ी केंद्रित माहौल होगा, महासंघों में पारर्दिशता आएगी और विवादों के समाधान में तेजी आएगी.” उन्होंने आगे कहा, ”इसके साथ ही महिलाओं और पैरा खिलाड़ियों को प्रतिनिधित्व मिलेगा.”

खेल प्रशासन विधेयक समय की मांग और सही दिशा में उठाया गया कदम: एनएसएफ

राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक का कानून बनने का मार्ग प्रशस्त होने पर देश के राष्ट्रीय खेल महासंघों (एनएफएस) और भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) की अध्यक्ष पी टी उषा ने मंगलवार को इस ऐतिहासिक नीति का स्वागत किया और इसे सही दिशा में उठाया गया एक कदम बताया क्योंकि भारत 2036 ओलंपिक की मेजबानी की दावेदारी की तैयारी कर रहा है.

अखिल भारतीय टेनिस संघ (एआईटीए) के अंतरिम सचिव सुंदर अय्यर ने पीटीआई को बताया, ”यह निश्चित रूप से अच्छा है क्योंकि इससे चीजें काफी स्पष्ट हो जाएंगी. सभी को नियमों और विनियमों के एक ही खाके का पालन करना होगा. इससे पहले अलग-अलग खेल संघों के लिए अलग-अलग नियम होते थे. अय्यर ने हालांकि कहा कि कार्यकारी समिति में सीटों को सीमित करना एक आदर्श स्थिति नहीं है.

उन्होंने कहा, ”भारत एक बड़ा देश है, इसलिए कार्यकारी समिति को 15 सदस्यों तक सीमित रखना मुश्किल होगा. इसमें से चार से पांच सदस्य असाधारण योग्यता वाले खिलाड़ियों और एथलीट आयोग के सदस्यों के पास चली जाएगी, इसलिए व्यावहारिक रूप से 36 राज्यों में से आप कार्यकारी समिति में केवल 10-11 सदस्य ही रख सकते हैं. यह बहुत मुश्किल है. इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए था, संख्या अधिक होनी चाहिए थी.” भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष और राज्य सभा की मनोनित सदस्य पीटी उषा ने भी इस विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि कहा कि इससे दशकों से चला आ रहा ठहराव दूर होगा और देश के खेल प्रशासन में ”पारर्दिशता और जवाबदेही” सुनिश्चित होगी.

उन्होंने राज्यसभा में कहा, ”आज का दिन व्यक्तिगत और राष्ट्रीय महत्व का है. मुझे इस दिन का लंबे समय से इंतज़ार था.” उन्होंने कहा, ” यह विधेयक पारर्दिशता, जवाबदेही और लैंगिक समानता लाएगा तथा एथलीटों को सशक्त बनाएगा और प्रायोजकों तथा महासंघों के बीच विश्वास पैदा करेगा. यह विधेयक न्याय और निष्पक्षता से जुड़ा हुआ है.” भारतीय भारोत्तोलन महासंघ के अध्यक्ष सहदेव यादव ने कहा, ” यह विधेयक 2036 के ओलंपिक के लिए प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण के अनुरूप है. यह संघों में कानूनी मामलों की संख्या को कम करेगा और खेलों को समृद्ध होने देगा. यह लंबे समय तक चलने वाली अदालती कार्रवाई पर होने वाले अनावश्यक खर्च को भी बचाएगा.”

अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ के अध्यक्ष कल्याण चौबे ने इससे होने वाले फायदे का जिक्र करते हुए कहा, ” कई राष्ट्रीय खेल संघ अदालती मुकदमों के बोझ तले दबे हैं. भारतीय ओलंपिक संघ 350 से अधिक मामलों में शामिल है. इस विधेयक में प्रस्तावित पंचाट (ट्रिब्यूनल) से काफी पैसे की बचत हो सकती है.” उन्होंने कहा, ”यह राष्ट्रीय नामों और प्रतीकों, जैसे ‘भारत’ या भारतीय’ जैसे शब्दों का खेल संगठनों द्वारा उपयोग किए जाने पर भी ध्यान देगा और किसी महासंघ या संघ की आड़ में समानांतर निकायों को बनने से रोक पाएगा.”

भारतीय एथलेटिक्स महासंघ के प्रवक्ता आदिल सुमरिवाला ने कहा, ” इससे एनएसएफ में बेहतर शासन आएगा. लगभग सभी एनएसएफ अदालती मामलों से प्रभावित हैं. हर दूसरे न्यायालय में चुनावों को चुनौती दी जाती है. कई अदालतों को (खेलों के बारे में) बहुत कम जानकारी है. विभिन्न अदालतों ने एक ही मामले में अलग-अलग फैसले दिए हैं, जिससे चीजें और भी जटिल हो जाती हैं. बीसीसीआई के लिए एक फैसला, आईओए के लिए उस तरह के ही मामले में अलग फैसला और एआईएफएफ के लिए अलग फैसला.” उन्होंने कहा, ” पहले यह खेल संहिता था इसलिए लोग इसमें अपने मुताबिक हेरफेर कर लेते थे लेकिन विधेयक और फिर कानून बनने के बाद ऐसा संभव नहीं होगा.

भारतीय बैडमिंटन संघ के सचिव संजय मिश्रा और हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप टिर्की ने भी इस विधेयक को ऐतिहासिक करार दिया.
मिश्रा ने कहा, ”यह भारत के खेल ढांचे को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं तक पहुंचने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है. इससे पारर्दिशता, खिलाड़ियों के कल्याण और जवाबदेह शासन जैसे मुद्दों पर सुधार होगा.

टिर्की ने कहा, ” यह सुधार खिलाड़ियों और सभी हितधारकों के बीच नया विश्वास जगाएगा, जिससे वैश्विक मानकों के अनुरूप एक शासन मॉडल तैयार होगा.” भारतीय टेबल टेनिस महासंघ के महासचिव कमलेश मेहता ने इसे ‘सही दिशा में एक बड़ा कदम’ करार देते हुए कहा, ”यह विधेयक विवादों के निपटारे सहित सभी पहलुओं पर ध्यान देता है जो महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी संगठन में मतभेद होना स्वाभाविक है. अब, इन मतभेदों को तेजी से सुलझाया जा सकता है.”

भारत के ऐतिहासिक खेल विधेयक ने कैसे आकार लिया
संसद में मंगलवार को ऐतिहासिक राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक पारित हो गया जिससे एक दशक से भी पहले शुरू हुआ वह सफर पूरा हो गया जिसमें इस संरचनात्मक सुधार के लिए प्रयासरत हितधारकों के लिए कई उतार-चढ़ाव आए. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह अधिनियम बन जाएगा जिसमें अधिक समय नहीं लगेगा और इसके साथ भारत अमेरिका, ब्रिटेन, चीन और जापान जैसे देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जिनके पास सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था के लिए कानून है.

यह सब 2011 में शुरू हुआ जब तत्कालीन खेल मंत्री अजय माकन उस बुनियादी ढांचे के साथ आए जिसमें आलोचनाओं का सामना करने वाले देश के खेल प्रशासकों के लिए कुछ मानक स्थापित करने की बात कही गई थी. प्रशासकों पर अक्सर सत्ता संघर्ष, आपसी कलह, वित्तीय हेराफेरी और इनमें से किसी भी मुद्दे पर काबू पाने के इरादे की कमी दिखाने का आरोप लगाया जाता रहा है. लेकिन नए विधेयक के साथ राष्ट्रीय खेल बोर्ड, राष्ट्रीय खेल पंचाट और राष्ट्रीय खेल चुनाव पैनल के माध्यम से जवाबदेही तय होगी.

वर्तमान खेल मंत्री मनसुख मांडविया के पिछले साल कार्यभार संभालने के तुरंत बाद हितधारकों के साथ महीनों तक चली बातचीत के बाद इसने आकार लिया है. यहां इस संहिता के महत्वपूर्ण बदलावों के साथ विधेयक में बदलने के सफर पर नजर डाली गई.

यात्रा:-
* 2011 में मंत्रालय ने राष्ट्रीय खेल विकास विधेयक का मसौदा तैयार किया और इसे अनुमोदन के लिए कैबिनेट के समक्ष रखा. हालांकि प्रशासकों के लिए आयु और कार्यकाल की सख्त सीमा के कारण इसका कड़ा विरोध हुआ.

* जुलाई 2013 में मंत्रालय ने राष्ट्रीय खेल विकास विधेयक का संशोधित मसौदा तैयार किया और सुझाव तथा टिप्पणियां आमंत्रित करने के लिए इसे सार्वजनिक डोमेन में रखा. हालांकि इस विधेयक पर आगे कोई कार्यवाही नहीं हुई और एक साल बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने खेल संहिता 2011 को बरकरार रखा.

* 2015 में राष्ट्रीय खेल विकास संहिता 2011 का पुन? मसौदा तैयार करने के लिए एक कार्य समूह का गठन किया गया था लेकिन इस समूह में भारतीय ओलंपिक संघ के शीर्ष अधिकारियों को शामिल करने को हितों के टकराव के मामले के रूप में दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी.

* 2017 में तत्कालीन खेल सचिव इंजेती श्रीनिवास की अध्यक्षता में ‘खेलों में सुशासन के लिए राष्ट्रीय संहिता (मसौदा) 2017’ तैयार करने हेतु एक समिति गठित की गई थी. ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता निशानेबाज अभिनव बिंद्रा, अंजू बॉबी जॉर्ज और प्रकाश पादुकोण जैसे अन्य महान खिलाड़ी तथा तत्कालीन आईओए प्रमुख नरिंदर बत्रा इस समिति के सदस्यों में शामिल थे.
इस मसौदा खेल संहिता को भी दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई जिसने आदेश दिया कि समिति की रिपोर्ट एक सीलबंद लिफाफे में उसे सौंपी जाए.

* 2019 में मंत्रालय ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) मुकुंदकम शर्मा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जिससे कि मसौदा खेल संहिता 2017 की समीक्षा की जा सके और इसे सभी हितधारकों के लिए स्वीकार्य बनाने के उपाय सुझाए जा सकें.
उसी वर्ष दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस समिति के गठन पर रोक लगा दी जो आज तक प्रभावी है.

* अक्टूबर 2024 में राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक का मसौदा जनता की टिप्पणियों और सुझावों के लिए जारी किया गया था. भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए), राष्ट्रीय खेल महासंघों (एनएसएफ), खिलाड़ियों, कोच, कानूनी विशेषज्ञों और यहां तक कि खिलाड़ियों के प्रबंधन से जुड़ी निजी संस्थाओं के साथ व्यापक परामर्श सत्र आयोजित किए गए थे. इस विधेयक को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) और विश्व एथलेटिक्स, फीफा और अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (एफआईएच) सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय महासंघों के साथ भी साझा किया गया था.
संसद में इसे पेश करने से पहले मंत्रालय को आम जनता सहित विभिन्न हितधारकों से 700 से अधिक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं.

* 23 जुलाई 2025: विधेयक लोकसभा में पेश किया गया.

* 11 अगस्त 2025: खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने कुछ संशोधनों के साथ विधेयक को लोकसभा में पुन? प्रस्तुत किया. संक्षिप्त विचार-विमर्श के बाद इसे पारित कर दिया गया.

* 12 अगस्त 2025: विधेयक को राज्यसभा में पारित होने के लिए प्रस्तुत किया गया जहां दो घंटे से अधिक समय तक चली चर्चा के बाद इसे पारित कर दिया गया.
खेल संहिता से अंतर:

* आयु सीमा: खेल संहिता में प्रशासकों की आयु 70 वर्ष निर्धारित की गई थी लेकिन नए विधेयक में किसी पदाधिकारी को अपना कार्यकाल पूरा करने की अनुमति दी गई है, यदि नामांकन दाखिल करते समय उनकी आयु 70 वर्ष से कम थी. यदि अंतरराष्ट्रीय कानून और उपनियम संबंधित खेल संस्था में चुनाव लड़ने की अनुमति देते हैं तो चुनाव लड़ने के लिए पांच साल की अतिरिक्त छूट दी गई है.

* कार्यकाल: खेल संहिता में अध्यक्ष के लिए दो कार्यकाल और कोषाध्यक्ष तथा सचिव के लिए दो कार्यकाल के बाद ‘कूलिंग ऑफ पीरियड’ (ब्रेक) के साथ तीन कार्यकाल की अनुमति थी. नया खेल विधेयक पदाधिकारियों (अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष) को अधिकतम 12 वर्षों के लगातार तीन कार्यकालों तक सेवा करने और ब्रेक के बाद कार्यकारी समिति के चुनाव के लिए पात्र बने रहने की अनुमति देता है.

* कार्यकारी समिति: खेल संहिता में समिति में महिलाओं के अनिवार्य प्रतिनिधित्व का कोई प्रावधान नहीं था जिसकी अधिकतम सदस्य संख्या 15 थी. नए विधेयक में यह अनिवार्य किया गया है कि कार्यकारी समिति में कम से कम चार सदस्य महिलाएं और उत्कृष्ट योग्यता वाले दो खिलाड़ी होने चाहिए.

* नियामक संस्था: खेल संहिता में राष्ट्रीय खेल महासंघों (एनएसएफ) पर नजर रखने के लिए किसी नियामक संस्था का प्रावधान नहीं था जिससे मान्यता देने या रद्द करने का अधिकार खेल मंत्रालय के पास था लेकिन खेल प्रशासन विधेयक में एक राष्ट्रीय खेल बोर्ड के गठन का प्रावधान है जो यह भूमिका निभाएगा.

* राष्ट्रीय खेल पंचाट जो खेल विवादों का निपटारा करेगा, राष्ट्रीय खेल चुनाव पैनल जो एनएसएफ में चुनावों की देखरेख करेगा और आचरण आयोग खेल संहिता का हिस्सा नहीं थे. इस विधेयक के अधिनियम बन जाने के बाद इन सभी निकायों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

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