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आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा के पीछे लोगों का स्नेह और समर्थन : होसबाले

नयी दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने बुधवार को कहा कि आरएसएस ने पिछले 100 वर्षों से, विरोध के बावजूद, जनता के स्नेह के कारण, सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बनने का प्रयास किया है. होसबाले की यह टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आरएसएस की शताब्दी के उपलक्ष्य में एक स्मारक डाक टिकट और एक सिक्का जारी करने से कुछ मिनट पहले आई. उन्होंने इस कदम के लिए सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि यह संघ के ”नि?स्वार्थ” कार्यों को मान्यता प्रदान करने के समान है.

होसबाले ने कहा कि संघ और उसके स्वयंसेवक 1925 में विजयादशमी के अवसर पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा इसकी स्थापना किए जाने के बाद से ही व्यक्तियों के चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के अपने मिशन पर बिना किसी स्वार्थ के काम कर रहे हैं. वह केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे.

आरएसएस के दूसरे नंबर के पदाधिकारी ने कहा, ”यह संघ के स्वयंसेवकों और देशभक्तों के लिए खुशी की बात है… कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने इस विशेष अवसर पर एक डाक टिकट और सिक्का जारी करने का फैसला किया है.” उन्होंने कहा, ”विदेश में रहने वाले स्वयंसेवकों सहित सभी स्वयंसेवकों की ओर से, मैं इसके लिए अपना आभार व्यक्त करना चाहता हूं.” होसबाले ने कहा कि राष्ट्र के प्रति योगदान के लिए व्यक्तियों और संगठनों को सम्मानित करना भारत में एक लंबे समय से चली आ रही परंपरा रही है.

उन्होंने कहा, ”भारत सरकार ने इस परंपरा को जारी रखा है. मेरा मानना ??है कि इस तरह संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर भारत के लोगों की ओर से संघ के कार्यों को मान्यता दी गई है.” होसबाले ने आरएसएस के 100 वर्षों को एक ‘दिलचस्प’ यात्रा बताया और कहा कि देश के लोगों द्वारा संघ के विचारों को मिले प्यार, समर्थन और स्वीकृति के कारण ही संघ इतनी दूर तक पहुंच पाया है.

उन्होंने कहा, ”संघ को हर तरह के विरोध, संघर्ष और उदासीनता का सामना करना पड़ा, लेकिन उस दिन से (आरएसएस की स्थापना के दिन से) संघ कार्यकर्ताओं ने लोगों की आत्मीयता, स्नेह, समर्थन और सहयोग का अनुभव किया है.” होसबाले ने कहा कि ”आरएसएस का विचार भारत का विचार है” जो इसकी जड़ों, इसकी संस्कृति और इसकी सभ्यता में समाहित है.

उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों से भारत के लोग इस विचार का पालन करते रहे हैं, इसे जीते रहे हैं और एक श्रेष्ठ समाज के निर्माण के संकल्प के साथ इसे आगे ब­ढ़ाते रहे हैं. उन्होंने कहा, ”हम उस विचार, उस जीवन दर्शन, उस संस्कृति की पहचान हैं.” होसबाले ने कहा कि संघ के विचार ने लोगों में फिर से आनंद जगाया है और उनमें यह विश्वास भरा है कि वे दुनिया में ”सर्वश्रेष्ठ समाज” के रूप में उभरने में सक्षम हैं.

उन्होंने कहा, ”आज देश संघ को देशभक्ति, अनुशासन और निस्वार्थ सेवा के एक प्रभावशाली और सफल प्रतीक के रूप में देखता है.” उन्होंने कहा कि संघ समाज को संगठित करने और उसके पुरुषार्थ को जागृत करने का प्रयास कर रहा है ताकि वह अपने रास्ते में आने वाली सभी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो सके.

होसबाले ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में दुनिया के सामने भारत की ‘विकृत’ छवि पेश करने के दुर्भावनापूर्ण प्रयास किए गए हैं.
उन्होंने कहा, ”पिछले कुछ वर्षों में, हमारे कार्यों की सफलता से देश और सरकारों की तस्वीर बदली है.” उन्होंने कहा, ”एक नया रास्ता सामने आया है. हमें देश के भीतर और वैश्विक मंच पर भी भारत के विमर्श को मजबूत करना होगा. दुनिया भर में, भारत के बारे में भारत का विमर्श सकारात्मक और सत्य पर आधारित होना चाहिए. अपनी शताब्दी के इस अवसर पर संघ का यही विचार है.” समाज में पांच गुना परिवर्तन लाने के आरएसएस के एजेंडे के तहत, होसबाले ने लोगों से स्वदेशी उत्पादों को ब­ढ़ावा देने और अपनाने तथा भारत को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि अपने ‘पंच परिवर्तन’ एजेंडे के साथ, आरएसएस देश के लोगों में ‘भारतीय’ मूल्यों, सही पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने और अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन करने के साथ ‘स्व’ की भावना का संचार करना चाहता है.

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