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RSS के गठन के बाद इसके किसी भी सदस्य ने न तो आजादी की लड़ाई में जान दी, न ही जेल गया: ओवैसी

हैदराबाद. एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने बृहस्पतिवार को दावा किया कि उनकी जानकारी के अनुसार आरएसएस के गठन के बाद इसके किसी भी सदस्य ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपने प्राणों की आहुति नहीं दी और न ही जेल गया. ओवैसी की यह टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र निर्माण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भूमिका की सराहना करने के बाद आई है.

यहां एक सभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने आरएसएस के संस्थापक केबी हेडगेवार की जीवनी का हवाला देते हुए दावा किया कि हेडगेवार ने 1930 में दांडी मार्च में हिस्सा लिया था और जेल भी गए थे, ताकि स्वतंत्रता सेनानियों को बाद में संघ में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर सकें. उन्होंने आरोप लगाया कि हेडगेवार का इरादा स्वतंत्रता संग्राम में वास्तविक भागीदारी का नहीं था.

ओवैसी ने कहा, ”मैं इस दावे से हैरान हूं कि आरएसएस ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था. प्रधानमंत्री मोदी को लंबे-लंबे भाषण देने की आदत है. जहां तक मैंने प­ढ़ा है, आरएसएस के किसी भी सदस्य ने इसके गठन के बाद न तो आजादी की लड़ाई में अपनी जान दी और न ही जेल गए.” उन्होंने दावा किया कि ब्रिटिश अभिलेखागार में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि आरएसएस कार्यकर्ताओं ने कभी स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया और न ही उनसे कोई खतरा था.

ओवैसी ने कहा, ”इसके अलावा, आरएसएस की पत्रिका ‘ऑर्गनाइजर’ ने 14 अगस्त, 1947 को लिखा था कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज के तीन रंग अशुभ हैं. यह बात प्रधानमंत्री को पता थी, लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया.” एआईएमआईएम प्रमुख ने कहा कि जब 23 नवंबर, 1949 को संविधान अपनाया गया था, तो आरएसएस ने ‘ऑर्गनाइजर’ में लिखा था कि उन्हें उस संविधान की नहीं, बल्कि ‘मनुस्मृति’ की जरूरत है.

उन्होंने दावा किया कि आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में ईसाइयों, मुसलमानों और वामपंथियों को भारत के लिए आंतरिक खतरा बताया था. एआईएमआईएम अध्यक्ष ने दावा किया कि आरएसएस बार-बार भारत के मुसलमानों पर शक करता है, लेकिन ‘काला पानी’ (अंडमान सेलुलर जेल) भेजे जाने वाले पहले व्यक्ति हैदराबाद के मौलवी अलाउद्दीन रहमतुल्ला थे.

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